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पी.एम. श्री कमला राम नौटियाल राजकीय आदर्श इंटर कॉलेज धौन्तरी, उत्तरकाशी (उत्तराखंड)

पी.एम. श्री कमला राम नौटियाल राजकीय आदर्श इंटर कॉलेज
धौन्तरी, उत्तरकाशी (उत्तराखंड)

का. कमला राम नौटियाल

                         एक नायक जिसने संघर्षों से तप कर पूरे किये सपने और दूरदृष्टि से दी नई पीढ़ी को दिशा
सच्चे अर्थ में लीडर कौन होता है? लोगों की तकलीफ के क्षणों में उनके साथ चट्टान की तरह खड़ा रहे, अपने हित अपनी सुविधाओं को दावं पर लगा दे, हर हाल में आगे बढ़ कर समाज को दिशा देना, पूरी बेबाकी से नेतृत्व करना और उसको अंजाम तक पहुंचा देना। इन सभी बातों का पर्याय हैं ‘कामरेड कमला राम नौटियाल’। जीवन के उतार चढ़ाव, जेल का डर, लुभावने प्रलोभन भी उनको विचलित न कर सके। उस जन नायक ने अपनी दूरदृष्टि से ऐसे बीज बोये जिसने नई पीढ़ी को दिशा दी और जो समय के साथ समाज में निखार लाते गये।
का. कमलाराम नौटियाल का जन्म 5 जुलाई 1930 में हुआ था। उनके पिता श्री विद्यादत्त नौटियाल, जो कि टिहरी नरेश के सामंती युग में पटवारी थे तथा उनके नाना उत्तरकाशी बाड़ाहाट में विद्वान जोशी परिवार से थे। राज शाही परिवार के थोकदार के रूप में उन्हें कोई कमी न थी। दस या बारह वर्ष की उम्र उन्होंने अपने दादा, दादी, नाना, नानी ताऊ और पिता को खो दिया और वो अपने माँ के साथ एकदम असहाय से हो गये। उनकी माँ उन्हें लेकर उनके ननिहाल आ गयी जहां उन्होंने कक्षा सात वर्नाकुलर मिडिल स्कूल (वर्तमान में राजकीय कीर्ति इंटर कॉलेज उत्तरकाशी) तक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद वो अपने चाचा के साथ देहरादून आ गये जो कि मालदेवता में मेसर्स राम प्रसाद करते थे। बृजमोहन दास नौटियाल के नाम से आढ़त का काम करते थे वर्ष 1947 में उन्होंने अपने चाचा जी की देख रेख में डी. ए.वी. हाई स्कूल से अपनी शिक्षा का सफर शुरू किया, और 1950 में हाई स्कूल विज्ञान विषय से उत्तीर्ण किया और 1952 में डी.ए.व. हायर सेकेंडरी से इंटरमीडिएट I इसके पश्चात उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। कमजोर आर्थिक स्थिति से उनके जीवन में कदम कदम पर अड़चन आ रही थी। मेहनत करके उनकी माँ इन स्थितियों में जितना कर सकती थी, उससे ज्यादा उन्होंने किया I तकलीफ सामने थी , तो मन उदास भी होता था। मगर एक संकल्प भी मन के भीतर मजबूती से घर बना रहा था। कोई भी सूरत बने, वो अपने पढ़ाई पूरी कर करेंगे इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए मां के अलावा ऐसे कई परिचितों ने भी मदद की I खास जिक्र स्कूल रोड, करोल बाग दिल्ली के संत परमानन्द ब्लाइंड रिफील मिशन (वर्तमान में संत परमानन्द हस्पताल नई दिल्ली) से जुड़े।

     जब वे उत्तरकाशी में थे, तो उस वक्त उन्होंने वहां पर मिशन की ओर से नेत्र शिविर आयोजित किया था I उन्होंने इस पुनीत कार्य के लिए अपने को पूरी तरह से प्रस्तुत कर दिया था I मरीजो के प्रति उनके व्यवहार और समर्पण ने सभी को प्रभावित किया था। जब मिशन की टीम दिल्ली लौटने लगी , तो उन्होंने का . कमला राम नौटियाल जी को खास तौर पर कहा कि जीवन में कभी किसी चीज की कठिनाई महसूस करोगे, तो जरूर संपर्क करना। इसी बात ने उन्हें प्रेरित किया था और उन्हें पढाई के लिए पैसों की दिक्कत से चिन्तामुक्त करा दिया। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए फीस का संकट खड़ा हुआ, तो मिशन के श्री हरिकिशन अग्रवाल जी मदद के लिए सामने आए और उन्होंने हर महीने 15 रूपये मासिक छात्रवृत्ति भेजनी शुरू कर दी। इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने तक छात्रवृत्ति का क्रम जारी रहा। सही मायने में यह क्षण उनको अहसास करा गया कि सच्चे मन से की गयी जन सेवा परमार्थ का कार्य है।
जिस तरह से पढ़ाई करने और आगे बढ़ने के लिए उन्हें और उनके परिवार को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, उसी तरह कई ऐसे परिवार होंगे, कई ऐसे बच्चे होंगे, जो ठीक उनकी जैसी स्थितियों का सामना कर रहे होंगे। उस स्थिति को करीब से देखने के कारण उनके मन में बार बार यह विचार आता था कि ऐसे छात्रों के लिए क्या किया जा सकता है, उनकी राह को कैसे आसान किया जा सकता है। असमानता से जुड़ी ये स्थिति कभी-कभी उनके मन के भीतर क्रांति की लौ भी जलाती थी। व्यवस्था में बदलाव करने की बातें मन में उठती थी, ताकि सभी के लिए समान अवसर हों।
तंगहाली से एक-एक दिन का गुजारा मुश्किल था, पढ़ाई जारी रखने की तो दूर की बात थी। उन्होंने कॉलेज में एडमिशन लेने का विचार त्याग दिया। खुद को यह दिलासा दी कि प्राइवेट परीक्षा दूंगा और जब स्थिति ठीक हो जाएगी, तो फिर कॉलेज में एडमिशन ले लूंगा। एक बार फिर, जिंदगी उत्तरकाशी की तरफ लौट आई थी। उन्होंने ठान लिया था कि उत्तरकाशी में रहकर ही समस्याओं का मुकाबला करूंगा और अपनी जन्मभूमि में सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहूंगा। शुरूआत एक स्वयंसेवक के तौर पर कीर्ति हाईस्कूल में कक्षा 8 से 10 वीं कक्षा तक के छात्रों को पढ़ाने से हुई। बच्चों को विज्ञान की पढ़ाई कराई। 1952 में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक संगठन बनाने का विचार आया। इसके परिणामस्वरूप ‘उत्तरकाशी भ्रष्टाचार निरोधक संघ’ का गठन हुआ। बाद में संगठन का नाम बदलकर ‘आदर्श नागरिक संघ’ कर लिया। यह संगठन तमाम सामाजिक कार्यों में अपनी अलग भूमिका निभाने लगा।
अब खाली पेट संघर्ष करना भी मुश्किल था। गुजर बसर के लिए कुछ तो करना ही था। ये सवाल लगातार उनके जेहन में मथ रहा था। बहुत सोचने के बाद उन्होंने एक निर्णय लिया और किताबों और स्टेशनरी की दुकान खोली। नाम दिया-‘कमल पोथी शाला’। वर्तमान में कमल पुस्तक भंडार है। दुकान से जो बिक्री होती, उससे घर चलाते। फिर भी कभी कभी ऐसा होता, कि दुकान से भी काम नहीं चल पाता, तो ऐसे में गांवों में लगने वाले मेले-कौथिग सहारा बनते। इन मेलों में फेरी लगाकर सामान की बिक्री करते। खैर दुकान, फेरी तो सिर्फ आजीविका के साधन भर थे, बाकी दिल दिमाग में तो पढ़ाई और समाज हित की ही चिंता रहती थी। इस बीच, यह जरूर हुआ कि दुकानदारी करते करते ही उत्तरकाशी टाउन एरिया कमेटी में विकास सलाहकार और उपभोक्ता भंडार में सलाहकार, सदस्य और अध्यक्ष जैसे पदों पर काम करने का मौका मिल गया।
फिर 1955 में उन्होंने देहरादून जाकर आगे की पढ़ाई करने का फैसला किया। दुकान की जिम्मेदारी छोटे भाई को सौंप दी। एक बार फिर वो डीएवी कॉलेज देहरादून में थे। उन्होंने बीए प्रथम वर्ष में एडमिशन लिया और पढाई में जुट गये।
संघर्षों के बीच 1959 में उन्होंने एल. एल. बी. पूर्ण किया। जून 1960 में वो उत्तरकाशी आ गये और वकालत शुरू कर दी। इसके उपरान्त वे उत्तरकाशी में आन्दोलनों के पर्याय बन गये। शुरआत हुई फरवरी 1960 में, जब उत्तरकाशी को टिहरी जिले से अलग कर के एक नया जिला बना दिया गया। नए जिले के लिए आधारभूत ढांचा खड़ा करने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही थी। उत्तरकाशी में नया प्रशासनिक परिवर्तन साफ महसूस किया जा रहा था। जिला मुख्यालय के लिए उत्तरकाशी नगर बाड़ाहाट के स्थानीय लोगों की उपजाऊ कृषि भूमि को जिला प्रशासन अधिगृहित कर रहा था। स्थानीय किसानों में नाराजगी थी। वह किसी कीमत पर अपनी जमीन देने के लिए तैयार नहीं थे। मगर नेतृत्व का अभाव एक बड़े आंदोलन की राह में अड़चन बना हुआ था। लोगों के साथ जुड़कर संघर्ष करने का पहला बड़ा मौका उनके सामने था। उन्होंने किसानों को संगठित करने का कार्य किया और एक जबरदस्त आंदोलन चला जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन को अधिग्रहण की प्रक्रिया रोकनी पड़ी। जिला प्रशासन को मुख्यालय के लिए कहीं जमीन नहीं मिली। एक बार फिर से किसानों के साथ जिला प्रशासन की बातचीत शुरू हुई। प्रशासन 750 रूपये प्रति नाली के हिसाब से जमीन खरीदने के लिए तैयार हो गया। इसके अलावा, किसानों को अन्य सुविधाओं का आश्वासन भी मिला। इस समझौते के बाद किसान अपनी जमीन देने के लिए तैयार हो गए। इसी जमीन पर आज का उत्तरकाशी जिला मुख्यालय, लोक निर्माण विभाग कार्यालय और जिला चिकित्सालय नजर आता है।
अगला पड़ाव था, ग्राम ठाँडी। ग्राम ठांडी-कमद के ग्रामीणों के चरान-चुगान संबंधी वन अधिकारों को लेकर आंदोलन सामने आ गया। सरकार के एक फैसले ने ग्रामीणों के वन अधिकारों को प्रभावित किया, तो आंदोलन शुरू हो गया था। 29 जून 1961 से शुरू हुआ यह आंदोलन कई दिनों तक चला। इस आंदोलन में ठांडी के सेम नामे प्लाट में जनविरोधी वृक्षारोपण की कोशिश की गई, लेकिन आंदोलनकारियों ने इसे जबरन रोक दिया। इसके नतीजतन उत्तरकाशी में भी विरोध-प्रदर्शन किया गया। जनता के वनाधिकारों के लिए वे पूरी ताकत से इस आंदोलन में जुटे। किसान आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज हुए। मगर आंदोलनकारी ताकतों का दबाव ही जीता। प्रशासन को किसान आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने पड़े।
एक ट्रांसपोर्ट कम्पनी के खिलाफ आन्दोलन में उनको पांच अक्टूबर 1967 को प्रीविक्शन डिटेंशन एक्ट यानी नजरबंदी कानून के तहत अरेस्ट करके टिहरी जेल भेज दिया गया। नजरबंदी कानून की धारा-सात के तहत उन्हें चार्जशीट सौंपी गई, जो कि नौ पेज की थी। 1960 से लेकर 1967 तक आम आदमी के हक में उन्होंने जो आंदोलन किए थे, उसे संक्षिप्त रूप में बतौर अपराध बनाकर चार्जशीट तैयार की गई थी। उनके साथ उनके साथी चंदन सिंह राणा, धर्म सिंह चौहान, केवल सिंह पंवार को भी जेल भेज दिया गया। उन पर भटवाड़ी में फौजदारी कानून की धाराओं के अंतर्गत केस बनाया गया था। वो जेल में थे और बाहर लोग विचलित थे। एक दिन पट्टी गजाणा कटूड से लोगों का हुजूम ढोल नगाड़ों के साथ विरोध प्रदर्शन के लिए निकल पड़ा। उनके साथ बाडागड्डी और बाडाहाट के लोग भी शामिल हो गए। ग्रामीण 20 से 25 मील पैदल चलकर उत्तरकाशी जिला मुख्यालय पहुंच गए। यहां जमा हुए करीब दो हजार लोगों ने जिला मुख्यालय को घेर लिया। यह स्थिति जिला प्रशासन के हाथ पांव फुला देने वाली थी। जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर उनकी रिहाई की मांग की गई। ग्रामीणों ने जिला मुख्यालय पर ही डेरा डाल दिया था और तब प्रशासन ने उनको 15 अक्टूबर 1967 को टिहरी जेल से बिना शर्त रिहा कर दिया।
कुटेटी कालोनी की कहानी भी इन आन्दोलनों में एक कड़ी है। उत्तरकाशी नगर की दूसरी ओर पट्टी बाडागड्डी के अनेक गांवों के किसानों की करीब 200 एकड़ जमीन की पहचान सिंचाई भूमि मंजलो सेरा के नाम से थी। सरकार ने इस जमीन को मनेरी भाली उप कालोनी के निर्माण के लिए अधिग्रहित करने की तैयारी कर ली थी। सरकार इस भूमि का मुआवजा 300 रूपये प्रति नाली के हिसाब से देना चाहती थी। जबकि किसान चाहते थे कि उनकी बंजर भूमि का इस्तेमाल किया जाए और चालतीमीन पर सरकार की नजर हैं, वह उनके पास ही रहे। सरकार ने अपनी तैयारियों को आगे बढ़ाते हए संबंधित जमीन पर पिलर्स गाड़ दिए। 27 अक्टूबर 1969 को का. कमला नौटियाल और अन्य लोग मुस्टिक सौड़ क्षेत्र की जनता की अगुवाई करते हुए ढोल बाजों के साथ मंजलो सेरा पहुंच गए। जमीन पर लगाए गए पिलर्स ढहा दिए गए और सभी प्रदर्शनकारी आगे बढ़ गए। यहां पर ऐलान किया गया कि सिंचाई की जमीन कतई नहीं दी जाएगी। प्रशासन से बात हुई, तो यह सुझाव दिया गया कि कि किसानों की कुटेटी की ढालदार भूमि पर कालोनी का निर्माण करा लिया जाए। दोनों पक्षों में समझौता हो गया और कालोनी कुटेटी की ढालदार भूमि पर ही बनी।
1969 में ही उत्तरकाशी महाविद्यालय की स्थापना के लिए भी जमकर आंदोलन करने की स्थिति बनी। इस आंदोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभायी। यह संघर्ष भी कामयाब रहा था और महाविद्यालय अस्तित्व में आ गया।
गढ़वाल विश्वविद्यालय की मांग को लेकर पूरे पहाड़ में जबरदस्त आंदोलन हुआ। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर स्थिति बने, ये सभी की इच्छा थी। यह सर्वदलीय आंदोलन रहा। का कमला राम नौटियाल ने अपने साथियों के साथ इस आंदोलन का प्रमुख हिस्सा रहा। 22 सितंबर 1971 को विश्वविद्यालय आंदोलन के तहत उत्तरकाशी बंद का आह्वान किया गया। करीब 40 लोगों को बंद के दौरान प्रशासन ने ज्यादा सक्रिय पाया और हमें धारा-107 और 117 में आरोपित कर दिया गया। इसके बाद, सभी को सीधे जेल भेज दिया गया। सभी चार दिन तक जेल में रहे और 25 सितंबर 1971 को रिहा हो पाए। सामूहिक संघर्ष का नतीजा रहा कि गढ़वाल विश्वविद्यालय की स्थापना हो गई।
सारे आन्दोलनों को सारांशित करते हुये उहोने तिलोथ के किसान परिवारों के लिए तिलोथ आन्दोलन, बडेथी में गोली काण्ड के बाद मजदूरों के लिए आन्दोलन, काशी विश्वनाथ मंदिर में अतिक्रमण का हटाना, वयाली में वन आन्दोलन जिससे उत्तराखंड की आज की वन नीति का जन्म हुआ आदि प्रमुख हैं।
उन्होंने समय के साथ ऐसे वृक्ष रोपे जो कि आने वाली पीढ़ी के साथ आज भी समाज के हर वर्ग को राह भी दिखती है और सुविधा भी है। एक और आंदोलन धौंतरी में जूनियर हाईस्कूल और अस्पताल खुलवाने के लिए चला। इसी कड़ी के साक्ष्य हैं, सरकारी अस्पताल धौन्तरी, रा. पॉलिटेक्निक, थौन्त्री एवं का. कमला राम नौटियाल राजकीय इंटर कॉलेज की स्थापना। यह इंटर कॉलेज आज एक आदर्श इंटर कॉलेज है एवं यहाँ के होनहार छात्र एवं शिक्षक, शिक्षा जगत में अपना परचम फहरा रहे हैं।
यह हमेशा ज्ञात रहे कि अथक मेहनत, कभी न हार मानने का जज्बा, समाज और अपने मातृभूमि के लिए कुछ करने की चाह रखने वालों और खुली आँखों से सपने देखने वालों के निशां वक्त के साथ कभी फीके नहीं पड़ते ।